कृषि

Kheti News: फ़ायदे का सौदा होगा ये सब्जी उगाना! अभी करें बुवाई… बारिश में होगी भरपूर कमाई

फरीदाबाद जिले के डीग गांव में रहने वाले किसान राजकुमार यादव इस बार भिंडी (ladyfinger farming) की खेती में नई शुरुआत कर रहे हैं। दो एकड़ जमीन में उन्होंने पहली बार इस फसल की...

Krishi News: फरीदाबाद जिले के डीग गांव में रहने वाले किसान राजकुमार यादव इस बार भिंडी (ladyfinger farming) की खेती में नई शुरुआत कर रहे हैं। दो एकड़ जमीन में उन्होंने पहली बार इस फसल की बुवाई की है। राजकुमार का कहना है कि भिंडी उगाना जितना मुनाफे का सौदा दिखता है, असल में उतना ही मेहनत और खर्च वाला काम भी है।

राजकुमार बताते हैं कि भिंडी की बुवाई के लिए पहले खेत में मेड बनाई जाती है और फिर उस पर बीज बोए जाते हैं। एक एकड़ खेत में करीब 8 से 10 किलो बीज की जरूरत होती है, और बीज बोते वक्त 4 से 6 उंगली का गैप जरूरी माना जाता है ताकि पौधे सही से बढ़ें। खेती की तकनीकी बारीकियों के साथ-साथ लागत भी कम नहीं है। राजकुमार का कहना है कि भिंडी की खेती में खीरे (cucumber farming) से भी ज्यादा खर्च आता है – एक एकड़ में करीब ₹50,000 से ₹55,000 तक की लागत बैठती है।

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इस लागत में सिर्फ खाद और सिंचाई ही नहीं, बल्कि कीटनाशक दवाइयों पर भी अच्छी-खासी रकम खर्च होती है। फसल को कीड़ों से बचाने के लिए किसान को कोराजन (Coragen) और दूसरी जरूरी दवाइयां समय-समय पर डालनी पड़ती हैं।

मंडी का रेट तय नहीं, मुनाफा अनिश्चित

राजकुमार कहते हैं कि भिंडी की तुड़ाई और साफ-सफाई में manual labour की ज़रूरत ज्यादा होती है। अगर घर की लेबर मिल जाए तो कुछ बचत हो जाती है, वरना बाहर से मजदूर लगाना पड़े तो मुनाफा निकलना मुश्किल हो जाता है। ऊपर से मंडियों में रेट (market price) का भी कोई भरोसा नहीं – कभी ₹20 किलो मिलते हैं तो कभी ₹25। दो महीने की मेहनत के बाद जब फसल तैयार होती है और बाजार में रेट गिरा हुआ मिलता है, तो किसान का हौसला टूटना लाज़मी है।

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खेती से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती – बिजली की कमी

राजकुमार के मुताबिक, खेती की सबसे बड़ी दिक्कत बिजली (electricity for farming) की है। गांव में खेतों तक बिजली नहीं पहुंचती। ऐसे में कभी-कभी तो सिर्फ नहर का पानी ही सहारा बनता है, और जब वो भी न मिले तो सिंचाई के लिए जनरेटर का सहारा लेना पड़ता है। जनरेटर चलाने में डीजल खर्च बहुत बढ़ जाता है, जिससे खेती की लागत और बढ़ जाती है।

खेती ही जीवन का आधार

52 साल के राजकुमार पिछले 30 सालों से खेती कर रहे हैं। वो कहते हैं, “कभी फायदा होता है, कभी नहीं… लेकिन हमने खेती कभी छोड़ी नहीं। यही हमारे परिवार की रोज़ी-रोटी का सहारा है।” तमाम मुश्किलों और बढ़ते खर्चों के बावजूद उनका हौसला कमजोर नहीं पड़ा। उनका मानना है कि अगर सही समय पर बारिश हो जाए और मंडी में रेट थोड़ा ठीक मिल जाए, तो भिंडी की फसल किसान के लिए मुनाफे की डील बन सकती है।

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फिलहाल राजकुमार उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार मौसम और बाजार दोनों उनका साथ दें – ताकि मेहनत का फल सिर्फ फसल में नहीं, आमदनी (profit from farming) में भी नजर आए।

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